अंतरराष्ट्रीय

फिल्म रिव्यू: लव आज कल

लव आज कल’ की कहानी दो कपल्स के बारे में बारे है. आज के टाइम में ज़ोई और वीर. दिल्ली में. और 90 के दशक में उदयपुर में रघु और लीना. इन दोनों जोड़ों की लव स्टोरी कभी बाहरी, तो कभी भीतरी वजहों से खटाई में पड़ती रहती है. दुनिया, दिमाग और करियर इनके प्रेम कहानी पर ब्रेक मारती रहती है. और फाइनली इसमें से एक लव स्टोरी अधूरी ही रह जाती है. जब मैंने ‘रॉकस्टार’ देखी थी, उसके ठीक बाद कहीं से मेरे सोशल मीडिया टाइमलाइन पर ‘सिंपल प्लॉट. कॉम्लेक्स कैरेक्टर्स’ लिखी हुई टाइप की एक चीज़ दिखी. मैंने उसका स्क्रीनशॉट निकाला और अपने डेस्क पर लगा लिया. घेर-घार के जैसे-तैसे निकलने वाली लाइफ इतनी जल्दी अपना घेरा पूरा करके वहीं लौट आएगी, ये तो मैंने कतई नहीं सोचा था. और शायद इम्तियाज़ ने भी नहीं. इस फिल्म के किरदार हर समय इमोशनली चार्ज्ड रहते हैं. हमेशा भारी-भरकम बातें ही करते हैं. बस उन्हें देखकर आपको ये नहीं लगता कि वो वाकई ये फील कर रहे हैं. बस यहीं ये फिल्म मैच हार जाती है.

परफॉरमेंस

और इसके ज़िम्मेदार हैं फिल्म के एक्टर्स और खुद इम्तियाज़ अली. कार्तिक ने डबल रोल किया है. 90 के दशक में स्कूलबॉय रघु वाला हिस्सा अगर छोड़ भी दें, तब भी कार्तिक फिल्म को हल्का और कम विश्वास करने लायक बनाते हैं. क्योंकि वीर वाले टाइम में उनकी इंटेंसिटी फर्जी लगती है. उन्होंने बहुत कोशिश की है लेकिन उस कोशिश का दिखाई देना, उनके खिलाफ चला गया. दूसरी तरफ हैं सारा अली खान. उनकी वजह से खिंचती हुई फिल्म चलने लायक बन पाती है. मुंहफट और मॉडर्न लेकिन कंफ्यूज़्ड. क्योंकि एक तरफ वो करियर की बात करती है और दूसरी तरफ प्रेम की. प्यार को हमेशा अपनी सेकंड प्रायोरिटी मानने वाली लड़की उसकी वजह से अपने करियर के साथ कॉम्प्रोमाइज़ कर लेती है. आरुषी शर्मा बहुत सिंपल लगती हैं और मजबूत भी. अगर उनसे स्टॉकिंग को रोमैंटिसाइज़ नहीं करवाया गया होता, तो मामला थोड़ा और बेहतर होता. अब आते हैं फिल्म की सबसे बड़ी कास्टिंग गूफ अप पर. फिल्म में रणदीप हुड्डा ने राज/रघु नाम के एक जीवन देख चुके अनुभवी आदमी का रोल किया है. और फिल्म में उनकी हालत ये है कि उनका रोल भी कार्तिक आर्यन ही कर रहे हैं. खैर, वो जितने भी सीन में हैं, वो फिल्म का बेस्ट एक्टिंग वाला चंक है. खासकर क्लाइमैक्स में, जब वो अपनी लव स्टोरी का क्लाइमैक्स बता रहे होते हैं.

ये फिल्म अच्छे नोट पर शुरू होती है. और उसी स्टाइल में बढ़ती चली जाती है. ये चीज़ आगे दिक्कत का सबब बन जाती है. हालांकि आपको इसमें इम्तियाज़ का रेगुलर फ्लेवर भी मिलेगा. जैसे सही-गलत, अच्छा-बुरा जैसी चीज़ें दुनियावी हैं. वो अंदर से आने वाला कनेक्शन. प्रेम के सहारे खुद को ढूंढना. एक-दूसरे को कंप्लीट करना. और वो बने रहना, जो हैं. बस इसमें फील की थोड़ी सी कमी रह गई. अब जो फिल्म खुद ही इन कॉन्सेप्ट्स को ही तज कर बैठी है, उसके बारे में आप वही बात कैसे कर सकते हैं. फिल्म के बारे में जो चीज़ थी, वो आपको बता दी गई है. बाकी अपने विवेक और इम्तियाज़ प्रेम के हिसाब से सोच-समझकर फैसला लें.

 

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